कोरोना संक्रमण दौर में अर्थव्यवस्था का सीधा असर वनोपज पर निर्भर महिलाओं पर, वनधन योजना स्थिति सुधारने में नाकाम


बस्तर- वैश्विक महामारी कोरोना के चलते पूरी दुनिया तबाह हो गयी वही दुनिया के तमाम समुदायों को इससे जूझना पड़ रहा है और इससे किन्ही का व्यापार तो किसी का रोजी रोटी में दिक्कत आ रही है, देश के अंदर  42% वनों से घिरा राज्य छत्तीशगढ़ वनोपज के दृष्टिकोण से देश के प्रमुख राज्यो में सम्मिलित है जहां कई प्रकार की बहुमूल्य वनौषधी पायी जाती है। इसके अलावा कई प्रकार के लघु वनोपज संग्रहित किए जाते है। छत्तीसगढ़ में लगभग 1200 करोड़ रूपए के लघुवनोपज का कारोबार होता है।
वन और वनोपज की बात करते ही हम सीधे तौर पे आर्थिक मूल्यों से जुड़ जाते है निश्चित तौर ओर इसका सीधा आशय आर्थिक ही है लेकिन दूसरा पहलू वन संसाधनो पे समुदायो का अधिकार एवं वन पे समुदायों के अधिकार के मूल्यों पर निर्भर करता है।


जंगल,महिलाये और वनोपज

वन क्षेत्रों में वनोपजो के संग्रहण का कार्य मुख्यतः महिलाएं ही करती है रोजमर्रा के जिंदगी में उपयोग में आने वाले साग सब्जियों से लेकर वन औषधि,कन्द मूल ,बीज सभी चीजो को जंगलो से ही लाती है साथ ही यही वनोपज और वन औषधि इन आदिवासी महिलाओं की प्रमुख आर्थिक स्त्रोत होता है जिससे वो अपना एवं पूरे परिवार का जिंदगी चलाती है,आदिवासी समाज मे मुख्यतः महिलाएं ही घरेलू अर्थव्यवस्था की अधिकारी होती है घर मे जरूरत पड़ने वाली छोटी छोटी चीजों से लेकर घर के आर्थिक व्यवस्था को प्रबंध करने का काम करती है सीजन में एकत्रित किये गए वनोपजो को घर से बाजार तक का सफर ये महिलाएं ही कराती है और बेचकर सप्ताह भर का राशन एवं दैनिक उपयोग की चीजें खरीद के लाती है यही कारण है कि वनोपजो और महिलाओं का सीधा और सकारात्मक जुड़ाव होता है।

वनोपजों पे धनाय बाई की बातें-


धनाय बाई कौडों जो कि उत्तर बस्तर कांकेर के अन्तागढ़ ब्लॉक के निकट एक गाँव से है वे बोलती है कोरोना का डर जंगलो तक पहुच गया है बजारे बन्द है बाजार में वनोपजों की खरीदी बिक्री नगण्य है ,इस वर्ष सिर्फ 3 दिन ही तेंदूपत्ता एकत्रित किये सरकार ने और समय नही दिया जंगलो में पत्ते पडे रहे है महुआ का फसल बहुत कम हुआ प्रत्येक वर्ष घर के उपयोग के अलावा महुआ बाजार में बेचते थे लेकिन इस सीजन घर के उपयोग के लिए ही मात्रा कम है फिर बेचना तो दूर की बात है मेरे परिवार में कुल 8 लोग है जिसमे 4 बच्चे है घर के खेती किसानी के साथ साथ घर सम्हालना वनोपज इक्कठा करना बेचना और घर चलाना मेरा ही काम होता है प्रत्येक बर्ष अनुमानित 50 से 60 हजार रुपये वनोपज जैसे साल बीज, हर्रा, बेहडा ,इमली, चार ,तेंदू ,लाख, इत्यादियों से प्राप्त हो जाता है जिससे मुझे अपने परिवार के देखरेख और घर चलाने रोजमर्रा की वस्तुओं के क्रय करने में दिक्कत नही होती है इस वर्ष उक्त इनकम का 30%ही मिलना लग रहा है जिससे इस वर्ष जिंदगी चलाने में बहुत कठिनाइयों के सामना करना पड़ रहा है सीमित साधन में घर चलाना पड़ रहा है वर्षा आधारित कृषि होने के कारण वनोपज हमारा सबसे बड़ा आजीविका का साधन है जैसे धान का बीमा करवाते है सरकार वैसे ही वनोपजों का भी कराना चाहिए

photo- sandeep baghel

सरकार,बाजार और समस्या-

कोविड19 के चलते है दुनिया का अर्थव्यवस्था ठप है इसका सीधा असर वनों पे आधारित बाजार पे पड़ा है वनोपजों के खरीदी बिक्री में बहुत दिक्कत का सामना करना पड रहा है बाजार सुनी पड़ी है जंगल के क्षेत्रों में लगने वाले साप्ताहिक बाजार पूरी तरीके से बंद है या बहुत सीमित हो चुकी है साथ ही आवागमन के बन्द होने से लोग बाजार तक पहुच भी नही पा रहे। मौसम के मार से वैसे ही इस सीजन बहुत सारे बनोपजो के उत्पादन में कमी आयी है महुआ तेंदूपत्ता जैसे महत्वपूर्ण वनोपज के उत्पादन एवम संचय में भारी गिरावट आई है सरकार की जारी दिशानिर्देश में वनोपजो के उचित कीमतों में बदलाव जरूर किया गया है लेकिन ग्राउंड 0 में इसका सकारात्मक असर नही दिख पाया है वन धन विकाश के तहत वनोपज को आजीविका मिशन से भी जोड़ा गया है जिसमे Trifed के अनुसार महिलाओं के शसक्तीकरण हेतु स्व सहायता या सहकारिता के माध्यम से वनोपजों की खरीदी ,संग्रहण इन समूहों के हाथ मे सौपा गया है, लेकिन बिना को स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और प्रोसेसिंग यूनिट जैसे महत्वपूर्ण साधनों के ये महिलाएं कैसे आत्मनिर्भर बनेगेछत्तीशगढ़ के संदर्भ में राज्य सरकार ने 821 हाट बाजारों को वनोपज संग्रहण केंद्र और 139 वन धन केंद्र बनाने का सोचे थे लेकिन सरकार इसमे भी फिस्सडी साबित हुई

क्या है वन धन योजना और TRIFED? और इनकी वर्तमान स्थिति-

आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम बढ़ चुकी है इसीलिए हमे वन धन योजना और TRIFED को समझना बहुत जरूरी है आइए समझते हैप्रधानमंत्री वन धन योजना, आदिवासी उत्पादों के मूल्य संवर्धन के माध्यम से आदिवासी आय में सुधार करने के लिए सरकार द्वारा की गई एक पहल है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आदिवासी समाज के आर्थिक विकास एवं वन धन का समुचित उपयोग करने में जनजातीय समुदाय की क्षमता का उपयोग देश के विकास हेतु करने के उद्देश्य से योजना का संचालन किया गया है। प्रधानमंत्री द्वारा आंबेडकर जयंती पर 14 अप्रैल 2018 को योजना के तहत पहला वन धन विकास केंद्र की स्थापना छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में स्थापित करने की घोषणा की गयी थी।इस केंद्र में जनजाति वर्ग के 300 युवाओं को कौशल विकास की ट्रेनिंग दिए जाने का प्रावधान किया गया है। योजना के अंतर्गत जनजातीय युवाओं को इमली, महुआ भंडारण, कलौंजी की साफ़-सफाई एवं पैकेजिंग की ट्रेनिंग देने के साथ हीं प्राथमिक प्रसंस्करण इकाई एवं फसलों के मूल्य वर्धन से सम्बंधित जानकारी दी जायेगी। जिससे उनके कार्यकुशलता में वृद्धि होगी और वन धन एवं आदिवासी जन धन का देश के विकास में पूर्ण रूप से उपयोग किया जा सकेगा। इस योजना का संचालन जनजातीय विकास मंत्रालय और (TRIFED) ट्राइबल कोआपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन आफ इंडिया के देख -रेख में किया जायगा। यह योजना आदिवासी जनजातीय वर्ग के युवाओं के कौशल विकास हेतु शुरू किया गया है जिसके लिए वित्तीय वर्ष के लिए, 2020-21 कुल बजट और कार्य योजना MSP की खरीद, अवसंरचना विकास, और वन धन विकास कार्यकम के लिए 1132.42 करोड़ रुपये है।


इस योजना के तहत वन धन विकास केंद्र में जनजातीय वर्ग के युवाओं को वन धन ईमली,महुआ के फूल के भंडारण , कलौंजी की सफाई एवं अन्य माइनर फारेस्ट प्रोडक्ट्स जैसे शहद, ब्रशवुड, केन्स,टसर तथा आदिवासी क्षेत्र में पायी जाने वाली अनेक प्रकार की जड़ी बूटियों के रख-रखाव की ट्रेनिंग एवं मार्केटिंग से सम्बंधित प्रशिक्षण दिया जाएगा।जिससे जनजातीय वर्ग के युवाओं की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी और आदिवासी क्षेत्र का विकास होगा एवं जनजातीय वर्ग की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।


आदिवासी जनजातीय वर्ग की कार्य क्षमता का देश के विकास में योगदान प्राप्त किया जा सकेगा।
वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी के लिए, लघु वन उत्पाद उनकी आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं। इस योजना के तहत, आदिवासी को एमएफपी के संग्रह और मूल्य संवर्धन में आदिवासी समुदाय के प्रयासों के प्रति निष्पक्ष और पारिश्रमिक रिटर्न सुनिश्चित करके आजीविका बनाने और आय उत्पन्न करने का मौका मिलेगा।30 आदिवासी के 10 स्वयं सहायता समूह गठित किए जाएंगे। इन समूहों को स्थायी कटाई / संग्रहण, प्राथमिक प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर प्रशिक्षण मिलेगा।


अपने स्टॉक को एकत्र करने के लिए समूहों में बनाया जाएगा और योजना में प्राथमिक प्रसंस्करण की सुविधा प्रदान की जाएगी।उक्त तथ्य सिर्फ कागजों के लिए ही बने है योजना का जन्मभूमि बीजापुर में ही इस योजना का क्रियान्वयन सही तरीके नही पाया है कौशल विकाश के बाद युवाओं के भविष्य के लिए कोई उचित तंत्र नही बना न ही कोई तकनीक का उदय हुआ है युवाओं की बड़ी संख्या बाहर राज्यो में जाकर मजदूर बनने को विवश है

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