जीवा परो जीवा पिसायता- पृथ्वी पर एक जीव दूसरे जीव पर निर्भर होती है यही पर्यावरण की मूल सिद्धांत है.


जीवा पर्रो जीवा पिसायता- 5 जून 2020 विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

पर्यावरण मुख्य रूप से दो घटक 1. अजैविक/निर्जीव घटक (Abiotic) – हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि, अकाश एवं 2.  जैविक/सजीव घटक (Biotic) – पेड़-पौधे, वनस्पतियां, जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, सुक्ष्म जीव की सम्मिलित इकाई है, जो एक आवरण के रूप में हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। पर्यावरण की जैविक एवं अजैविक घटकों की भौतिक, रासायनिक गुणधर्म तथा उनकी क्रियाएं व प्रतिक्रियाएं ही प्रत्येक जीवधारी अथवा उसके पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करते हुए उनके रूप जीवन और उत्तरजीविता को सुनिश्चित करता है।

सामान्यता पर्यावरण को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया- (1) प्राकृतिक पर्यावरण – यह प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। (2) मानव निर्मित पर्यावरण – इसके अंतर्गत कृषि क्षेत्र, औद्योगिक, शहर, विमानक्षेत्र एवं अंतरिक्ष स्टेशन इत्यादि आते हैं। (3) समाजिक पर्यावरण –  पृथ्वी में लोगों के सांस्कृतिक मूल्य, मान्यताओं, भाषाई, धार्मिक रीति रिवाज एवं जीवनशैली आदि के आधार पर सामाजिक पर्यावरण का निर्माण होता है।

पर्यावरण दिवस- बस्तर के आदिवासियों का माटी तिहार

 इस प्रकार हमें मालूम होना चाहिए कि हम किस प्रकार से विश्व के प्राकृतिक पर्यावरण, मानव निर्मित पर्यावरण एवं सामाजिक पर्यावरण से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहकर हम सब अपने आसपास के आवरण को खुद तैयार करते हैं व उसे प्रभावित करते हैं। हमें यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि इस आधुनिक युग में मानव निर्मित पर्यावरण और सामाजिक पर्यावरण में हमारे असंतुलित व अनियमित विकास के कारण ही आज  प्राकृतिक पर्यावरण भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है जो क्लाइमेट चेंज के दुष्परिणाम के रूप में हमारे सामने आया है।

 नतीजा प्रकृति में जैव विविधता खतरे में पड़ती जा रही है और चुंकि हम मनुष्य है इसलिए सामान्य जिंदगी में हम अपने आपको संपूर्ण जीव जगत में सर्वश्रेष्ठ प्राणी व अजय समझते हैं। इसलिए हमारे सामने अन्य पशु-पक्षी, जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे, वनस्पतियां व सुक्ष्म जीव की जिंदगी अधिक मायने नहीं रखती है। हमारे लिए प्रकृति की अन्य अजैविक घटक हवा, पानी, मिट्टी भी सिर्फ उपभोग का साधन मात्र बन कर रह गया है। जबकि  यही अजैविक घटक ही हमारे जीवन का मूल आधार है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में परस्पर सहयोग के साथ एक दूसरे से मिलजुल कर रहने से ही सुख, शांति एवं आनंद का बोध होता है। प्रकृति में समस्त जीव जगत का ऐसे ही परस्पर सहयोग से एक दूसरे से मिलकर रहने के भाव को सहजीविता का सिद्धांत कहते हैं। प्रकृति में प्रत्येक जीव जिसमें हम मनुष्य भी शामिल हैं अपने जीवन के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे पर ही निर्भर रहते हैं इसे #आदिवासीजीवनदर्शन के #कोयापुनेम में “#जीवापर्रोजीवापिसायता” कहते हैं।

 इस प्रकार प्रकृति में हम मनुष्य उसी समय तक सुरक्षित जीवन जी सकते हैं जब तक प्रकृति में अन्य जीव-जंतु, पेड़-पौधे, वनस्पतियां, कीड़े-मकोड़े व सूक्ष्मजीव सुरक्षित है और वह भी तभी तक सुरक्षित रहेंगे जब तक प्रकृति के पंचतत्व हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि व आकाश संतुलित, सुरक्षित व प्रदूषण से मुक्त रहेगा।

 इसलिए यदि हम अपनी खुद की सुरक्षा चाहते हैं और यह चाहते हैं कि हमारे आने वाली कई पीढ़ियां हमारे व हमारे पुरखों की तरह सुरक्षित जीवन जिए तो फिर हमें प्रकृति के “#जीवापर्रोजीवा_पिसायता” के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए अपने सामाजिक पर्यावरण, मानव निर्मित पर्यावरण एवं प्राकृतिक पर्यावरण में संतुलन को बनाकर रखना होगा एवं यह संकल्प लेना होगा कि प्रकृति में समस्त जैवविविधता संतुलित बनी रहे इसके लिए हम प्राकृतिक संसाधनों को अपने निजी लाभ, महत्वाकांक्षा एवं अनियमित मापदंड वाले अनियंत्रित विकास की भेंट नहीं चढ़ने देंगे। दुनिया के प्रकृति’ जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए संघर्ष की जीवन जीने वाले सभी जनजाति समुदाय व अन्य की रक्षा करेंगे व उनका सम्मान करेंगे। पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाएंगे। अपने आसपास हरा भरा रखेंगे, पेड़ पौधे लगाएंगे। साथ ही हम मनुष्य अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, नस्लभेद, वर्ण भेद, जाति भेद की दुर्भावना को बुलाकर एक दूसरे की रक्षा करते हुए परस्पर सहयोग, सामंजस्य से मिलजुल कर रहेंगे। किसी का शोषण अत्याचार नहीं करेंगे। किसी के हक अधिकार को नहीं छिनेंगे। एक दूसरे की संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे, उस पर अतिक्रमण नहीं करेंगे, व उसका सम्मान करेंगे तभी हमारा पर्यावरण प्रकृति सुरक्षित रहेगा।

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस की सभी को ढेर सारी बधाईयाँ  

 964 total views,  2 views today


Facebook Comments

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

पर्यावरण दिवस- बस्तर के आदिवासियों का माटी तिहार

मात्रात्मक त्रुटि के कारण संवरा जनजाति के जाति प्रमाण पत्र को फर्जी घोषित कर एफ आई आर दर्ज कराने की कार्यवाही पर रोक लगाई जावे- आर एन ध्रुव