सुरता : खुमान साव की पहली पुण्यतिथि


आज ही छत्तीसगढ़ी ने छत्तीसगढ़ छोड़ दिया थाजोहार चंदैनी गोंदा खुमान साव

आज खुमान साव जी की पहली पुण्यतिथि पर उन्हें सुरता करते हुए मन मस्तिष्क में उनकी तमाम मधुर धुनें बज रही हैं। वही बेंजो की ट्यूनिंग, ढोलक, तबला अउ पेटी से निकलती जी को जुड़ानेवाली धुनें। खुमान साव छत्तीसगढ़ी संगीत की बड़ी पहचान हैं। संम्पन्न परिवार में जन्मे खुमान साव को संगीत से उत्कट प्रेम था और वे किशोरवस्था में ही छत्तीसगढ़ी नाचा के पुरोधा दाऊ मंदराजी की ‘रवेली नाचा पार्टी’ में शामिल हो गए थे। उन्होंने बाद में राजनांदगांव में आर्केस्ट्रा की शुरुआत की और कई संगीत समितियों की स्थापना की थी। पर महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब वे दाऊ रामचंद्र देशमुख के लोक सांस्कृतिक संस्था ‘चंदैनी गोंदा’ से जुड़े। यहां एक और हस्ती इसमें शामिल हुई जिसका नाम था, लक्ष्मण मस्तूरिया जिनका कल ही जन्मदिन था। 1970 में ‘चंदैनी गोंदा’ के माध्यम से इन तीनों कलाकारों ने जो सिरजा, वही आज हम सुनते हैं, गुनते हैं, वही छत्तीसगढ़ी संगीत की पहचान है।

सुरता : खुमान साव की पहली पुण्यतिथिआज खुमान साव जी की पहली पुण्यतिथि पर उन्हें सुरता करते हुए मन मस्तिष्क में उनकी…

Posted by Piyush Kumar on Monday, June 8, 2020

खुमान साव जी का महती कार्य है छत्तीसगढ़ में परंपरा से चले आ रहे लोक संगीत की व्यवस्थित करना, उसे तराशना और ऐसी अमरता प्रदान करना जिसे सुनकर जी मन देह अउ प्राण में आनंद बरस जाता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ लोकधुनों की आत्मा को सँवारा है, उसे मधुरता दी है और ऐसे प्रस्तुत किया है कि वही छत्तीसगढ़ की पहचान बन गयी।

वीरेंद्र बहादुर सिंह अपने एक लेख में लिखते हैं, – ‘चंदैनी गोंदा’ के उद्भव के पूर्व छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का पारंपारिक स्वरूप ज्यों का त्यों गांवों, खेतों, खलिहानों में उत्सव के राग रंगों और नाचा गम्मत की टोलियों तक ही सीमित था। ‘चंदैनी गोंदा’ के माध्यम से श्री खुमान साव ने यत्र तत्र बिखरे हुए बहुप्रचलित पारंपारिक लोक गीतों कर्मा, ददरिया, नचौरी, सुआ, गौरा, विवाह गीत, बसदेवा गीत, सोहर, भोजली, पंथी तथा देवी जसगीतों को उनकी मौलिकता बरकरार रखते हुए परिष्कृत और परिमार्जित कर अपने कर्णप्रिय संगीत के द्वारा लोकप्रिय बना दिया। छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोक गीतों के अलावा श्री साव ने छत्तीसगढ़ के स्वनाम धन्य कवियों द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, स्व. प्यारे लाल गुप्त, स्व. हरि ठाकुर, स्व. हेमनाथ यदु, पं. रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मण मस्तुरिया, पवन दीवान एवं मुकुंद कौशल के गीतों को संगीतबद्ध कर उसे जन जन का कंठहार बना दिया।”

मोर संग चलव रे… धरती मैय्या जय होवय तोर…मन डोले रे माघ फगुनुवा… मोर खेती खार रूनझुन… धनी बिना जग लागे सुन्ना… मंगनी मा मांगे मया नई मिलै… मोर गंवई गंगा ए… बखरी के तुमा नार बरोबर… पता दे जा रहे गाड़ी वाला… गीतों को सुन लीजिए और समझिए कि खुमान साव का मयार कितना बड़ा है। खुमान साव जी को छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015 से सम्मानित किया जा चुका है। खुमान जी अंतिम समय तक अपनी सर्जना में सक्रिय रहे थे। उन्हें सिर्फ एक बार ही सुनने का अवसर मिला था। और भी उनसे बहुत कुछ जानने, समझने की इच्छा थी पर यह इच्छा ही रह गयी।

हम छत्तीसगढ़िया लोगों का मूलभाव है, उसे खुमान साव जी के गीतों में आप समझ सकते हैं। उनकी सर्जना, उनके कार्य का महत्व बताने से जुबां लाचार है। वे किंवदंती हैं। श्रद्धान्जलि स्वरूप उनका संगीतबद्ध एक मधुर गीत “शहर डाहर के जवईया… ” प्रस्तुत है। इस गीत के बोल और संगीत से उपजा भाव ही छत्तीसगढ़ की आत्मा है। उनकी पहली पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ की माटी, हवा पानी, चिरई चिरगुन, खेतों से उठती तान… सब उन्हें नमन करते हैं। आप इन्हीं सब के संगीत रूप में सदैव जीवित रहेंगे

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