400 रुपए प्रति किलो से ज्यादा में भी बिकता है बस्तर का बोड़ा


बस्तर- बस्तर का लज़ीज बोड़ा बारिश के साथ बाजार में पहुंच चुका है। बस्तर के बाजारों में इन दिनों सबसे महंगी सब्जी के रूप में बोड़ा की आवक बढ़ गई है। आदिवासियों का जंगलो पर आश्रित वन संपदाओं में बोड़ा भी प्रमुख रूप से आता है, जिसे वो बेचकर अपने जीवन-यापन करते है।


आपने सब्जी खरीदने वाले हर व्यक्ति इन दिनों एक ही बात कहता मिलता है , कि सब्जी के दाम आसमान छू रहे हैं, हां मगर वे सबसे महंगी सब्जी का दाम सुन लेंगे तो बेशक अपने कानों में यकीन ही नहीं कर पाएंगे , लेकिन सामान्य सब्जी की कीमत 50 रुपए तक आ जाती है, हालांकि सीजन की शुरुआत में जब कोई भी नई सब्जी आती है तो उनका दाम 100 रुपए प्रति किलोग्राम हो सकता है , बाद में दाम गिर जाती है. लेकिन आपने बस्तर को इनकी प्राकृतिक सौंदर्य से जानते हैं ,इस प्रकृति सौंदर्य में सबसे महंगी बिकने वाला सब्जी बोड़ा पाया जाता है। 


प्राकृतिक सौंदर्य से साल वनों को देखकर बस्तर को साल वनों दीप कहा जाता है क्योंकि बस्तर में उत्तम किस्म की साल पाया जाता है। बस्तर के आदिवासियों द्वारा चैत माह से नव वर्ष या आमाखानी त्यौहार बनाया जाता है क्योंकि नव वर्ष में प्रकृति में पेड़ पौधे पुराने पतियों को त्याग कर नए कोमल पल्लवन पतियों का जन्म देती है,  तब प्रकृति सुगंध से वातावरण मस्त रहती है । प्रकृति सुगंध से वातावरण  मदमस्त रहती हैं. कुछ दिन बाद मानसून के फुहारों में सरोबोर होने वाला बस्तर हैं। 

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वही बस्तर के जन समुदाय के चेहरे पर मानसून आने के बाद एक अलग ही खुशी नजर आती है । वह खुशी में एक ऐसा खुशी है जो सब्जी जी से खाने के लिए साल भर इंतजार करना पड़ता है । बस्तर में मानसून  आने के पहले  तेज बारिश और उमस के चलते साल वनों में जमीन के अंदर गाठ नुमा, छोटे-छोटे, आलू की तरह साल वनों के जंगल में दरार को कुदाल से खोदकर जमीन से बोड़ा निकाल लेते हैं , इस साल  वनों के जमीन  में बोड़ा का अपने आप प्राकृतिक द्वारा उत्पन्न होता है ,ना ही बोड़ा  को  उगाया  जाता है ना ही इसका खेती किया जाता है सिर्फ प्राकृतिक द्वारा उत्पादन किया जाता है । क्योंकि आदिवासियों द्वारा पर्यावरण को संतुलित रखने का एक क्षमता होती है ,इस कारण प्रकृति की गोद में बोड़ा उत्पादन होती है ।बस्तर के आदिवासी द्वारा मौसम की तेज बारिश और उमस के चलते साल वनों में बोडा निकालने के लिए जाते हैं। साल वनो के जंगलों से संग्रहित कर आदिवासी बाजार में बिकने के लिए ले जाते हैं, बरसात के पहले सीजन में पहली बोडा बाजार पहुंचता है , तो इसे खरीदने के लिए कभी कभी टूट पड़ लेते हैं । लेकिन बस्तर में इस बोड़ा को किलोग्राम से  नहीं बिका जाता है । यहां के आदिवासी हजारों वर्ष पहले मुरियान  सभ्यता एवं मोहनजोदड़ो सभ्यता से आ रही मापक विधि जो दोनी, सोली एवं पहली की दर पर खरीदा या बिका जाता है । इन  आदिवासियों को पुराने नापतोल के हिसाब से  भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस मापक विधि का कोई प्रभावित नहीं करती है । वर्तमान में 1800 किलोग्राम की दर से बस्तर में खरीदा जा रहा है, इसे पहली की दर से देखा जाए तो 1 किलो को 1600  और 400 रुपए में एक सोली , 100 रुपए एवं  50 रुपए में दोनी की दर से बेचा जाता  हैं. लेकिन बस्तरिया बोड़ा को बाहरी व्यक्तियों के द्वारा खरीदने के कारण बोड़ा की कीमत आसमान छू लेती है ,क्योंकि बस्तरिया बोडा कई गुणकारी तत्व पाया जाता है। इस कारण बाहरी व्यक्तियों द्वारा इससे व्यापार के रूप उपयोग कर लेते हैं। 


आपने बचपन में पढ़ा होगा कि अंगूर खाने से शुगर लेवल एवं ब्लड प्रेशर  लिए फायदेमंद होता है ,लेकिन बस्तर के आदिवासियों ने शुगर हाई ब्लड प्रेशर के लिए बोडा को सब्जी बना कर खाते हैं , क्योंकि इस बोड़ा में कई गुणकारी तत्व जैसे सेल्युलोज  व कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है, जिसके कारण ब्लड प्रेसर एवं शुगर को  बोड़ा मात देती है । सरगी पेड़ के जड़ों से निकली हुई विविध रासायनिक   पदार्थ  को हल्बी बोली में धूप कहते हैं ।आदिवासी  क्षेत्र अनुसार बोड़ा को  दो प्रकार से देखा जाता  है । जब शुरुआत में यह बोड़ा काले रंग और बाजार में सबसे पहले आता है तो बेहद नरम होता इसे हल्बी बोली में जात बोड़ा कहते हैं ।इसके अलावा दूसरा बड़ा ऊपरी परत सफेद होने के कारण यह वह कड़क होती हैं इसे लाकडी बोड़ा कहते हैं. जो बेहद बुरा रंग रहता है। जात बोड़ा से लाकड़ी बोड़ा कम क़ीमत होती हैं।

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