जन्मदिन पर याद : मरांग गोमके(जयपाल सिंह मुंडा)


कई दशक पूर्व आदिवासियों के लिए एक अलग राज्य की परिकल्पना करने वाले और झारखंड अलग राज्य के आंदोलन के जनक जयपाल सिंह मुन्डा को झारखण्ड के लोग इन्हें सर्वोच्च नेता यानी मरांग गोमके के नाम से पुकारते हैं। मरांग गोमके मुंडारी शब्द है, जिसका अर्थ है सर्वोच्च नेता। इनका असली नाम प्रमोद पाहन था।

इनका जन्म झारखंड की राजधानी से 27 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच बसे खूंटी के एक छोटे गांव टकरा हातुदामी में 3 जनवरी 1903 को हुआ। इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा रांची के सेंटपॉल स्कूल में प्राप्त की। जब वह नौवीं कक्षा के छात्र थे, विशप ने उन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया। वहां स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1928 में अर्म्सटर्डम ओलंपिक के लिये उन्हें भारतीय हाकी के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गयी। यह वही हाकी टीम थी, जिसमें हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद भी खेल रहे थे। उनके नेतृत्व में 1928 में भारतीय टीम ने समर ओलंपिक में स्वर्ण पदक भी जीता। उनका चयन इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) में हो गया था। आईसीएस का उनका प्रशिक्षण 1928 के एम्सटरडम ओलंपिक में भाग लेने के कारण प्रभावित हुआ। वापसी पर उनसे आईसीएस का एक वर्ष का प्रशिक्षण दोबारा पूरा करने को कहा गया उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और भारत चले आये ।

जयपाल सिंह मुंडा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक प्रभावशाली वक्ता भी थे। नेहरू जी के ओजस्वी भाषण की विवेचना करते हुए 19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में भारत को आजाद, सार्वभौमिक देश घोषित करने वाला प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जयपाल सिंह मुंडा ने ऐसे विचार प्रकट किए थे जो आज भी प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।

उन्होने कहा था… ” मैं तो जंगली हूं… इस प्रस्ताव के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को समझना मेरे बस की बात नहीं है। परंतु मैं इतना अवश्य जानता हूं कि इस देश को आगे बढ़ाने के लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा। मैं यह भी जानता हूं कि इस देश के निवासियों का एक वर्ग ऐसा है जिसके साथ सदियों से दुव्यवहार किया जाता रहा है, जिसकी उपेक्षा की गई है। यह सब कुछ वर्षों पहले से नहीं हो रहा है, बल्कि पिछले छह हजार सालों से जारी है। सिंधु घाटी की आदिवासियों को सिंधु घाटी से निकालकर, जंगलों में भगा दिया था। तब से वह वहां रह रहे हैं। उस समय से ही उसका हर प्रकार का शोषण हो रहा है। तब से लेकर आज तक उसके पास जो कुछ भी था वह उससे छीन गया है। इसके विरुद्ध आक्रोश प्रकट किया, कभी-कभी विद्रोह भी किया। मैं आदिवासियों को अल्पसंख्यक या वंचित वर्ग कदापि नही मानता, वे इस देश के प्रथम नागरिक हैं किसी भी सूरत में इनका हक-हकूक इस देश पर पहला है “

मारंग गोमके को आज 3 जनवरी को जन्म दिवस पर हूल जोहार..!!

(नरेंद्र गुप्ता के वाल से / 2016)

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