इतिहास की उपेक्षा का शिकार जयपाल सिंह मुंडा,पढ़िए जयपाल सिंह मुंडा की भूमिका जिनको संवैधानिक इतिहास लिखने वालों ने उपेक्षा की है


(1) जयपाल सिंह की संविधान सभा में भूमिका की संवैधानिक इतिहास लिखने वालों ने उपेक्षा की है। उन्होंने पूछा था क्यों इस संविधान सभा में सिर्फ छः ही आदिवासी प्रतिनिधि ही मौजूद हैं। इसके लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने क्या किया? हमारे लोग नस्लवाद, हिंदुओं और उन जैसे बाहरी लोगों के नस्लवादी से पिछले छह हजार वर्षों से उत्पीड़ित हैं। शब्दों की ऐसी बाजीगरी और कुछ नहीं है तीखे तेवर लिए जयपाल सिंह कहते गए कि यह हमारे साथ धोखा है। संविधान सभा की लगातार बहसों की श्रृंखला में 29 अगस्त 1947 की बैठक में जयपाल सिंह ने संवैधानिक अधिकारों की स्वायत्तता, क्षेत्राधिकार और विधायन सम्बन्धी कुछ मूलभूत और मौलिक सवाल उठाए। संविधान सभा की बहस में विशेषकर जयपाल सिंह द्वारा की गई आपत्तियों को जिस तरह से एकतरफा नजरअंदाज किया गया वह संविधान सभा की कार्यवाही पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। जयपाल सिंह के इस तर्क में वजन है कि गैरआदिवासी बहुमत बिना आदिवासियों से मुनासिब विमर्श किए उनके भविष्य के लिए सब कुछ कैसे तय कर सकता है। संविधान सभा में आदिवासी सदस्यों की नगण्य संख्या के सवाल पर भी कोई समाधानकारक उत्तर नहीं मिलता।

(2) जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को लक्ष्य (उद्देशिका) सम्बन्धी प्रस्ताव संविधान सभा में रखा था। उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते 19 दिसम्बर को जयपाल सिंह ने कहा कि मैं उन लाखों अज्ञात लोगों की ओर से बोलने के लिए यहां खड़ा हुआ हूं, जो आज़ादी के सबसे महत्वपूर्ण, लेकिन अनजान लड़ाके हैं और भारत के मूल निवासी हैं। उन्हें बैकवर्ड ट्राइब्स, प्रिमिटिव ट्राइब्स, क्रिमिनल ट्राइब्स और न जाने क्या क्या कहा जाता है। हमें अपने जंगली कहलाने पर गर्व हैं क्योंकि यही संबोधन है जिसके द्वारा हम लोग देश में जाने जाते हैं। तीन करोड़ आदिवासियों की ओर से मैं संकल्प का समर्थन करता हूं, इस भय से नहीं कि इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक बड़े नेता ने प्रस्तावित किया है। हम इसका समर्थन इसलिए करते हैं क्योंकि यह देश के हर नागरिक की धड़कन और उसकी भावनाओं को जाहिर करता है। एक ‘जंगली‘ और एक आदिवासी होने के नाते संकल्प में गूंथी गई जटिलताओं में हमारी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। हममें से हर एक ने आज़ादी के लिए संघर्ष की राह पर एक साथ मार्च किया है। अगर देश में कोई दुव्यवहार का सबसे ज़्यादा शिकार हुआ है, तो वे हमारे लोग हैं। पिछले छह हजार सालों से उनकी उपेक्षा हुई है और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया है।

(3) जयपाल सिंह आहत अभिमान की मुद्रा में कहते गए कि मैं सिंधुघाटी सभ्यता का वंशज हूं। उसका इतिहास बताता है कि आपमें से अधिकांश लोग, जो यहां बैठे हैं, बाहरी हैं, घुसपैठिए हैं, जिनके कारण हमारे लोगों को अपनी धरती छोड़कर जंगलों में जाना पड़ा। आप सब लोग आदिवासियों को लोकतंत्र सिखा ही नहीं सकते, बल्कि आपको ही उनसे लोकतंत्र सीखना है। आज हमें जरूरत सरकार से ही सुरक्षित होने और महसूस करने की है। हम कोई अतिरिक्त या विशेष सुरक्षा की मांग नहीं कर रहे हैं। बस यही चाहते हैं जो नागरिक बर्ताव सबके साथ हो, वही हमारे साथ भी हो। आदिवासियों को बराबर का नागरिक समझा जाए। मैं आदिवासी समुदाय को अल्पसंख्यक नहीं मानता। आदिवासी इस देश के मूल निवासी हैं। उनके साथ भूमिहीन और सामाजिक रूप से बाहरी जातियों को जोड़ना चाह रहे हैं, तो हम इसका विरोध करेंगे, क्योंकि आदिवासी अल्पसंख्यक या वंचित वर्ग कदापि नहीं हैं। किसी भी परिस्थिति में आदिवासियों का हक-हकूक देश पर पहला है। उसे खारिज करने का अधिकार किसी को नहीं है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया‘ में सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में लिखा है-‘कई आदिवासी गणराज्य थे जिनमें से कइयों का बहुत बड़े क्षेत्र पर विस्तार था।‘ जयपाल सिंह ने तंज कसा कि कांग्रेस नेताओं को बधाई है और उन अल्पसंख्यकों को भी जो अपनी जनसंख्या के अनुपात से संविधान सभा में अधिक प्रतिनिधित्व पा गए हैं। सिक्खों, ईसाइयों, एंग्लोइंडियनों और पारसियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में अधिक जगहें दी गई हैं। देश के मूल और प्राचीन निवासी आदिवासियों की स्थिति उपेक्षित है।

(4) मुख्य धारा में आदिवासियों को लाने का आशय कुछ सदस्यों की राय में जिनमें सरदार पटेल और गोविन्दवल्लभ पंत भी शामिल थे एक तरह से आदिवासियों के हिन्दूकरण करने या उन्हें उनकी कला और संस्कृति के इतिहास से अलग समझकर हिन्दू धर्म की इकाई के रूप में संविधान की परिभाषा में दर्ज करने की बौद्धिक जिद की तरह रेखांकित किया जा सकता है। जनजाति मंत्रणा परिषद को लेकर भी जयपाल सिंह के तर्कों में संवैधानिकता के अतिरिक्त एक कुटिल समाज व्यवस्था स्थापित करने का आरोप लगाना साफ साफ पढ़ा जा सकता है। वे परिषद को राज्यपाल या राज्य शासन के रबर स्टाम्प की तरह बनाने का विरोध कर रहे थे। यह संवैधानिक अजूबा है कि यदि सब कुछ राज्यपाल और राज्य शासन को केन्द्र सरकार के निदेशों के तहत आदिवासी जीवन के भविष्य के लिए तय करना है, तो फिर संविधान में आदिवासियों को आदिम जाति परिषद का झुनझुना देने की क्या जरूरत थी। यह इतिहाससम्मत तथ्य है कि देश में करोड़ों आदिवासी हजारों वर्षों से कथित मुख्यधारा के नागरिक जीवन से कटकर वन क्षेत्रों में अपनी संस्कृति, परम्परा, स्थानिकता, सामूहिकता और पारस्परिकता के साथ जीवनयापन करते रहे हैं। संविधान और प्रशासन के अमल में यह आना एक मनुष्यप्रेरित परिघटना है। उसे सदियों से चली आ रही आदिवासी जीवन पद्धति की उपेक्षा करते हुए उसमें हस्तक्षेप करने का स्वयमेव अधिकार ले लेना संविधान के मकसदों से मेल नहीं खाता। आदिवासियों की इस आपत्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनके अधिकारों का प्रतिरक्षण करने वाला सुरक्षात्मक संवैधानिक प्रावधान निश्चित किए बिना यदि संविधान के भाग 3 में वर्णित मूल अधिकारों में देश के हर नागरिक को कहीं भी रोजगार करने, जाने या बस जाने का अधिकार तय कर दिया जाएगा तो आदिवासी क्षेत्रों की संवैधानिकता तथा पारंपरिक स्वायत्तता कैसे रह पाएगी। संविधान में इसकी पूरी अनदेखी की गई है। आदिवासी जीवन को लेकर प्रारूप समिति के विचारण में एक ऐसा कालखंड है जिसकी कार्यवाही तो दर्ज है लेकिन उस पर किन इरादों से प्रारूप समिति में बहस की गई थी उसका कोई ब्यौरा नहीं मिलता।
कनक तिवारी
अधिवक्ता, दुरुग, छत्तीसगढ़

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