जिरहनामा- आदिवासी के लिए पेसा का ठेंगा


आदिवासियों के लगातार प्रबल विरोध से थक हारकर केन्द्र सरकार ने 10 जून 1994 को आदिवासी सांसद दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में समिति बनाकर अनुसूचित जनजाति इलाकों में मुनासिब पंचायती व्यवस्था के लिए सिफारिशें देने का जिम्मा सौंपा। समिति ने जनवरी 1995 को रिपोर्ट सौंपते आदिवासियों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। 1996 में संसद ने आदिवासियों के हित के लिए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (पेसा) पारित किया था। उससे आदिवासी कतई संतुष्ट नहीं हैं। सरकार ने सुझावों को कारगर किया होता तो आदिवासियों के जीवन में इतना खलल नहीं पड़ता, जो सरकारी ऐंठ के कारण वे रोज झेल रहे हैं। पेसा कर्म में कचर पचर है। अधिनियम आदिवासियों को दिखाऊ शो पीस समझाता है। सबसे पुरानी और जीवंत कौम के रूप में उन्हें स्वीकार नहीं कर पाया। आदिवासी की भाषा, बोली, संस्कृति, कला, पारंपरिक ज्ञान और उसके जीवन पर शहरी सभ्यों द्वारा हमला किया जा रहा है। अंगरेजों के खिलाफ धारदार विद्रोह कर चुके आदिवासियों के इन्कलाबी तेवर इतिहास का गौरवपूर्ण हिस्सा हैं।

पेसा और पंचायत अधिनियम में इस बात के प्रावधान नहीं हैं कि आदिवासी समुदायों तथा ग्राम सभा को भूमि, जल, वन, तथा लघु वनोपज पर अधिकार होंगे जिनकी सुरक्षा की जाएगी। साथ ही निस्तार तथा प्राकृतिक संसाधनों जैसे चराई, ईंधन, चारा, लघु वनोपज तथा भवन निर्माण संबंधी वस्तुओं पर आदिवासियों का पारंपरिक अधिकार साकार किया जाएगा। पेसा में कई दायित्व और अधिकार ग्राम सभा को देने के बदले पंचायतों को भी साथ साथ दिए गए हैं। ग्राम सभा को अधिकार किताबी भाषा में दिए गए हैं। उनका अनुपालन लेकिन नहीं होता। ग्राम सभा की बैठकों में कलेक्टर और पुलिस कप्तान दबंगई के साथ हाजिर रहते हैं। मासूम, अल्पशिक्षित और प्रताड़ित ग्राम सभा सदस्य दबाव में रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से सुप्रीम कोर्ट के जजों और हाई कोर्ट के जजों को नियुक्त करने भी केन्द्र सरकार मशविरा करती है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ बनाकर खुद तय कर लिया कि मशविरा शब्द का अर्थ सहमति है। संवैधानिक मशविरा के बदले आदिवासी की सहमति क्यों नहीं ली जाती? केन्द्रीय योजना आयोग की विशेषज्ञ समिति ने भी सिफारिश की थी कि राज्य के कई कर्मियों का नियंत्रण ग्राम सभा में होना चाहिए। भूरिया समिति ने चालीस बिंदुओं की सिफारिशें कीं। आधी सिफारिशों का क्या हुआ, केन्द्र सरकार बता तक नहीं पाएगी।

भूरिया समिति ने कहा है कुदरती दौलत आदिवासियों को सरकारी भेंट, भीख या खैरात और दहेज नहीं है। पेसा परंतुक लगाता है कि सरकारी या निजी क्षेत्र के लिए अनुसूचित इलाके से खनिज, वन और जल तथा अन्य संपत्तियां ले ली जाएंगी। आदिवासी फकत अपनी परंपरा, संस्कृति, रूढ़ि, कला वगैरह की सुरक्षा के आधारों पर ग्राम सभा नामक संस्था के जरिए आपत्ति कर सकते हैं। आदिवासियों के जीवन के बुनियादी मालिकी हक सरकार द्वारा छीन लेना गैरसंवैधानिक है। तिकड़म से सरकारी काॅरपोरेशन का कंधा देकर अदानी, अंबानी, टाटा और वेदांता जैसे समूहों को जबरिया दे देना संवैधानिक मूल्यों की हेठी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में कभी कभी ही लचीला दार्शनिक रुख झलकता है। भूरिया रिपोर्ट को संसद की सिलेक्ट कमेटी के सामने विचार के वक्त कई खुलासे हुए होंगे। वे जानकारियां आदिवासियों को क्यों नहीं बताई गईं?

पेसा बनने के बाद भी कई राज्यों ने पंचायत अधिनियमों का वांछित अनुकूलन नहीं किया। आदिवासी विषयों, समस्याओं और यथार्थ के महत्वपूर्ण जानकार भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रहे डा. ब्रम्हदेव शर्मा ने तत्कालीन सांसद अरविंद नेताम के साथ मिलकर मध्यप्रदेश के बस्तर जिले में छठी अनुसूची लागू करने के लिए सड़क आंदोलन चलाया था। तत्कालीन भाजपा सरकार के साथ साठगांठ करते बस्तर के आदिवासी नेता महेन्द्र कर्मा ने गैरआदिवासी सेठियों के साथ मिलकर ऐसा हिंसक माहौल बनाया कि नेताम और शर्मा को पुलिस के साए में बस्तर से हटाया गया। डाॅ. शर्मा को तो निर्वस्त्र तक गुंडों के द्वारा किया गया क्योंकि उसमें तत्कालीन भाजपा सरकार की शह थी। भूरिया समिति ने लिखा है पांचवीं अनुसूची क्षेत्र की शासन व्यवस्था पर राज्य की विधायिका को पहले मंत्रणा परिषद से परामर्श करना चाहिए। भूरिया समिति के सदस्यों ने पाया कि महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी राज्यपाल पद पर लादने के बावजूद वह गरिमामय पद संवैधानिक और संसदीय मर्यादाओं के पिंजड़े में फंसा दिया गया है। भूरिया समिति का यह महत्वपूर्ण सुझाव भी केन्द्र सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया।

भूरिया समिति ने यह भी पाया कि आदिवासी इलाकों में सरकारी कारिंदे आदिवासी जीवन में दादागिरी और अवांछित दबंगई के कारण लगातार बाधक बने हुए हैं। इसलिए भूरिया समिति के सदस्यों ने विचार कर एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि उन्हें ग्रामसभा के तहत रखा जाए। आदिवासी को लगता है कि सरकार मशीन या रोबोट है। उसे मुफलिसों से करुणा, प्रेम या सहानुभूति का सरोकार नहीं होता। लोग पेसा का झंडा उठाकर आदिवासियों को बरगला रहे हैं। मानो सरकारें हातिमताई है और पेसा कानून रामबाण दवा। सुप्रीम कोर्ट तक ने गिने चुने मुकदमों में भूरिया समिति की सिफारिशों का उल्लेख और उद्धरण तो दिया लेकिन पेसा की सुधारात्मक आलोचना करने का सुप्रीम कोर्ट को अवसर था। सुप्रीम कोर्ट ने जरूरत नहीं समझी।

कई कलेक्टरों को पेसा तथा वनाधिकार अधिनियम का अंतर न तो स्पष्ट है, न ही उसकी जानकारी है। केरल बनाम भारत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिसकी जमीन होगी उसकी ही खनिज संपत्ति होगी। इसी का छत्तीसगढ़ी तर्जुमा है ‘‘मावा नाटे, मावा राज।‘‘ सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में वेदांता मामले में तो यहां तक कहा है कि लोकसभा और विधानसभा से भी ग्रामसभा ज्यादा महत्वपूर्ण संस्था है। अनुसूचित क्षेत्रों में तो राज्य सरकार की हैसियत महज एक व्यक्ति के बराबर है, जो गैरआदिवासी है। इसलिए अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र व राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। कैलाश बनाम महाराष्ट्र में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि आदिवासी ही इस देश के मूल नागरिक हैं। बाकी बाद की और बाहरी संतानें हैं।

भाषा की जुमलेबाजी से बेहतर है कानून की आत्मा का पालन किया जाए। मंत्रिपरिषद्, राज्यपाल और नौकरशाह अधिक से अधिक अधिकारों के तालाब या झीलों की तरह हैं। उनमें आदिवासी विकास के लिए झरनों या नदियों की तरह सेवा, करुणा और कर्तव्यमयता का बहाव संविधान के बावजूद रुका हुआ है। लल्लो चप्पो करना सरल है। सरकारी कोठियों में जनदर्शन का रस्मअदायगी शोशा है। बिना लागलपेट या पक्षपात के वास्तविक अमल किया जाए तो मूल निवासियों के आदिवास की सांस्कृतिक उपस्थिति को विकास की अवधारणाओं के साथ जोड़कर दुनिया में एक आदर्श जनतांत्रिक रोल माॅडल के रूप में गौरवान्वित किया जा सकता है। आदिवासी जीवन शहरी समाज और सरकारी तामझाम के बरक्स एक सदी से ज्यादा पीछे है। संविधान की मंशा है कि सरकार सेवा संस्था है। उसे तिलिस्मघर बना दिया गया है। मंत्रियों में आत्ममुग्धता इतनी है कि अपने खिलाफ एक शब्द नहीं सुनते। आदिवासियों में जनतांत्रिक चेतना उसकी नई पीढ़ी के लगातार शिक्षित होने से मुखर हो जाए, तो अधिकार बनाम कर्तव्य का एक नया संवैधानिक फलसफा इतिहास पढ़ेगा।

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