आदिवासी समुदाय का नववर्ष:’चैतरई पर्व’


रायपुर- पर्व-त्यौहार आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न अंग है।पर्व के माध्यम से ही किसी समुदाय विशेष के पारंपरिक ज्ञान को पीढी-दर-पीढ़ी प्रवाहित किया जाता है। आदिकाल से ही यह समुदाय प्रकृति के समीप रहा है।इनका जनजीवन अधिकांशतः प्रकृति पर ही निर्भर है।प्रकृति ही इनके लिए सर्वस्व है। आदिवासी पर्वों की प्रमुख विशेषता भी यही है कि प्राकृतिक संतुलन बनाते हुए प्राकृतिक व्यवस्था बनाए रखना।इनका कोई भी पर्व प्रकृति के विरूद्ध नहीं होता।आदिवासी पर्वों की प्रमुख विशेषता है-

1.प्राकृतिक संतुलन
2.जैव विविधता संरक्षण
3.पारंपरिक ज्ञान
4.सामुदायिक एकता
5.वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आदिवासी अंचल में पर्व को ‘पंडुम’ कहा जाता है,जिसका अर्थ है-व्यवस्था(प्राकृतिक संतुलन) को बनाए रखना,जो इनके पुर्वजों द्वारा हजारों वर्षों तक संरक्षित रखते हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित किये गये हैं। प्रकृति के सभी जीव-जंतुओं,पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों का आदिवासी समुदाय में विशेष योगदान है।कभी मौसम के पूर्वानुमान में तो कभी प्राकृतिक आपदा का संकेत देने के लिए प्रकृति ने हमेशा मानव समुदाय को सहयोग किया है।पर्वों के माध्यम से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता अर्पित की जाती है।

       'चैतरई' भी एक ऐसा पर्व है,जिसमें प्रकृति में उपजे फल-फूल व वनस्पतियों का कब व कितनी मात्रा में उपभोग किया जाय यह पारंपरिक ज्ञान समाहित है।मूलरूप से यह पर्व चैत्र माह में मनाया जाता है। यह आदिवासियों का नववर्ष भी कहलाता है।इसे 'आमाजोगानी','आमातिहार', 'मरका पंडुम', 'मरका पोहलाना', 'मेन्दुल तिन्दाना' आदि नामों से भी जाना जाता है।यहां आमा,मरका व मेन्दुल का अर्थ है-'आम' अर्थात यह पर्व 'आम का पर्व'कहा जाता है।चैतरई पर्व में आम के फल के अतिरिक्त नव वनोपज फलों जैसे- चार,तेंदु,भेलवा,इमली,महुआ आदि के सेवन से पूर्व इन्हें पूर्वजों  को अर्पित करने का रिवाज है और यही पर्व का मुख्य उद्देश्य है। चैतरई पर्व मनाने की कोई निश्चित  तिथि नहीं होती।क्षेत्रीयता व सांस्कृतिक आधार पर तिथिगत भिन्नताएं होती है।पर्व मनाने की पूर्व संध्या को गांव के गांयता(पुजारी) द्वारा देवगुड़ी(देवस्थान) की साफ सफाई की जाती है।पर्व के दिन गांयता द्वारा उपवास भी किया जाता है।ग्रामवासी सुबह से ही विभिन्न पूजा सामग्रियों( मौसमी फल-फूल, नारियल,नींबू,अगरबत्ती, धूप,लाली,बंदन) के साथ देवगुड़ी में पहुंचते  हैं।परगना के सभी ग्राम प्रमुख(गांयता,पटेल, सिरहा)भी उपस्थित रहते हैं। पूरे विधि-विधान से सेवा अरजी(पूजा) करने के पश्चात परिपक्व फलों को सर्वप्रथम देवी-देवताओं,पुर्वजों को अर्पित किया जाता है, फिर प्रसाद के रूप में इन फलों का वितरण किया जाता है।चैतरई पर्व मनाने के पूर्व इन फलों के सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है।फलों के परिपक्व होने के बाद ही पुर्वजों को उनका भाग अर्पित करके ही इनका सेवन किया जाता है।पूरे हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है।यह पर्व सामुदायिक एकता का प्रतीक है।

प्राकृतिक दृष्टि से देखा जाय तो फलों के परिपक्व होने के लिए उनमें बीजकोष का बनना आवश्यक है, यदि अपरिपक्व फल का सेवन करते हैं,तो उस एक बीज से बनने वाला भावी पौधा एवं कई फलों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं।यदि इसी तरह अपरिपक्व फलों का सेवन किया जाय तो फलों की यह प्रजातियाँ भी नष्ट हो जाएंगी, जो जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत हानिकारक होगा। आदिवासी समुदाय ने प्रकृति के संरक्षण की व्यवस्था को अपने पर्वों में समाहित कर लिया है।

चैतरई पर्व का वैज्ञानिक आधार यह है कि अपरिपक्व फलों की अपेक्षा परिपक्व फलों में अधिक पौष्टिकता पाई जाती है।जैसे आम के कच्चे फलों को खाने से पाचन संबंधी नुकसान होने लगता है।इनमें कई औषधीय गुण(विटामिनA,C,E, आयरन,सोडियम, पोटेशियम) पाए जाते हैं, जो हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह जैसी बीमारियों से बचाने में सहायक होते हैं तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर शारीरिक पोषक तत्व प्रदान करते हैं।गर्भवती महिलाओं में आयरन की मात्रा बढ़ाकर हीमोग्लोबिन के स्तर को संतुलित करता है।ग्रीष्मकालीन फल होने के कारण गर्म मौसम से शरीर में पानी की मात्रा को बढ़ाकर ‘डीहाइड्रेशन’ की समस्या को कम करता है।अनेकों पोषक तत्वों से परिपूर्ण आम के फल को समय पूर्व सेवन किये जाने से इसकी प्रजाति भी दुर्लभ हो जाएगी।इन फलों का सेवन भी संतुलित मात्रा में करना आवश्यक है,यदि लालचवश अधिक सेवन किया जाता है तो पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं(दस्त) होने लगती है।इसलिए प्राकृतिक संतुलन के साथ-साथ शारीरक संतुलन भी आवश्यक है।

   क्षेत्रीयता के आधार इन फलों से संबंधित और भी पर्व हैं।जैसे-नारायणपुर क्षेत्र में 'कोहका चाड़' पर्व मनाया जाता है।दक्षिण बस्तर में 'इरूक पंडुम' या 'महुआ पंडुम' मनाया जाता है।सभी पर्वों का उद्देश्य एक ही है-फलों के सेवन के पूर्व उन पुर्वजों को अर्पित करना,जिन्होंने फलों की इन प्रजातियों का संरक्षण करने के पारंपरिक ज्ञान को पीढी-दर-पीढ़ी प्रवाहित किया।
        वर्तमान तकनीकी युग में जहां प्रकृति को हानि पहुंचाकर विकास करके पर्यावरण दिवस मनाने का दिखावा किया जा रहा है, वहीं आदिवासी समुदाय ने प्रकृति को अनंतकाल तक संरक्षित करने की व्यवस्था को अपनी पारंपरिक व्यवस्था में सम्मिलित कर लिया है।
रीना कोमरे
रीना कोमरे

रीना कोमरे पीएचडी शोधार्थी है, अभी वर्तमान में भिलाई में निवासरत है।

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