सामुदायिक वन संसाधन अधिकार की मान्यता और प्रबंधन के संबंध में बस्तर जिले में दो दिवसीय प्रशिक्षण प्रारंभ


जगदलपुर:- बस्तर जिले में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार की मान्यता एवं प्रबंधन के संबंध में 22 से 24 नवंबर तक आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण का शुभारंभ आज जिला पंचायत जगदलपुर के सभाकक्ष में किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य कार्यपालन अधिकारी सुश्री ऋचा चौधरी , ए. सी .टी. डब्ल्यू विवेक दलेला , अधिवक्ता उच्च न्यायालय बिलासपुर डॉ. शालनी गेर , प्रदान संस्था बस्तर प्रीतम गुप्ता, ए टी आर ई ई के डॉ. शरद चंद्र लेले, अनुभव सोरी , योगेश नरेटी की उपस्थिति तीन दिवसीय कार्यशाला प्रशिक्षण प्रारंभ हुई।सामुदायिक वन संसाधन अधिकार की मान्यता और प्रबंधन के उद्देश्यों एवं इसके सफल क्रियान्वयन हेतु जमीनी स्तर पर किए जाने वाले कार्यों के बारीकियों के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दी।


इस अवसर पर प्रशिक्षण कार्यकम में डॉ. शालनी गेरा ने सामूहिक अधिकार की प्रेरणा और वन अधिकार कानून का योगदान के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वनों एवं वन्य संसाधनों की रक्षा वहां पर रहने वाले आदिवासियों ने की है। वनाधिकार मान्यता अधिनियम वनों में रहने वाले आदिवासियों को उनके वाजिब हक को दिलाने में अत्यंत कारगर साबित होगा।इस कार्य में लगे सभी लोगों को अपने कार्य को पूरी सावधानी एवं निष्ठापूर्वक करते हुए इसका सफल क्रियान्वयन हो सकता है।कार्यशाला में अनुभव सोरी ने बताया कि सामुदायिक वन अधिकार के तहत् निस्तार, लघु वनोपज संग्रहण, जैव विविधता एवं बौद्धिक सम्पदा और पारम्परिक ज्ञान, जलाशयों के उत्पाद, चरागह, अन्य पारम्परिक अधिकार जैस देव स्थान, सामुदायिक वन संसाधन, नजरी-नक्शा तैयार करने तथा स्थल सत्यापन, ग्रामसभा में दावा, सामुदायिक विकास अधिकार, दावों के परीक्षण एवं स्वीकृति हेतु समितियां, सत्यापन हेतु साक्ष्य इत्यादि के विषय में विशेषज्ञ समन्वयकों द्वारा विस्तारपूर्वक अवगत कराया गया। बैठक में उन्होंने बताया कि सामुदायिक वन अधिकार का वास्तविक अर्थ अनुसूचित जनजाति एवं अन्य वर्ग के सदस्य से मिलकर बनने वाले समुदाय जो वनभूमि एवं वन संसाधनों का परम्परागत तरीके से उपभोग कर रहें है को ही वनभूमि पर सामुदायिक उपयोग हेतु किये जाने का प्रावधान है। सामुदायिक वन अधिकार में निस्तार के लिए जलाउ लकड़ी, मरघट, पारम्परिक बाजार स्थल, चारा लाने का अधिकार, लघु वनोपज संग्रहण के अंतर्गत महुआ, बांस तेंदूपत्ता, चिरोंजी, साल, बीज, आंवला, ईमली इत्यादि जैसे गौण उत्पाद के अधिकार दिये गये हैं जबकि जैवविविधता एवं बौद्धिक सम्पदा और पारम्परिक ज्ञान के तहत् गोटूल, पारम्परिक वन औषधि का ज्ञान, लोकनृत्य, संगीत वाद्ययंत्र और पशु-पक्षियों के संरक्षण को शामिल किया गया है। बैठक में यह भी बताया गया कि दावा करने वाले ग्राम का नजरी-नक्शा तैयार करने के अलावा उस गांव की पारम्परिक सीमा का निर्धारण सभी ग्रामों की वनाधिकार समितियों की सहमति से किया जाता है। इस नजरी-नक्शा के अनुसार गांव की पारम्परिक सीमा का सत्यापन करने तथा उसके भीतर का क्षेत्रफल निकालने हेतु एक तिथि तय की जाती है जिसकी सूचना संबंधित ग्राम की वनाधिकार समिति द्वारा सीमावर्ती सभी गांवों की समिति, उपखण्ड स्तरीय समिति, वनविभाग, राजस्व विभाग एवं सीमावर्ती क्षेत्रों भी लिखित रूप में देना होता हैं।


योगेश नरेटी ने बताया कि गांव बरसने के इतिहास और गांव में किस तरह की पारंपरिक व्यवस्था को बनाए रखना है। सिरहा गुनिया मांझी मुखिया का इतिहास बताते हुए। बुजुर्गों से कथन कैसा पूछना है। सीमावर्ती गॉव के विवाद को कैसे निपटारा करना है इन सभी बातों को अवगत कराया।जैव विविधता तथा बौद्धिक संपदा पारम्परिक ज्ञान अधिनियम को अवगत कराया। ग्राम सभा अधिकार को अवगत कराया गया।

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